उदास शामें
" अब ये भी नही ठीक के हर दर्द मिटा दें कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिये हैं..."" जब मैं इस पोस्ट को लिख रहा हूँ तब उस हादसे को हुए पूरे छह साल गुजर गए हैं। सोच रहा हूँ अगर गमों से मन को कुछ निजात मिले तो अगले साल से कुछ अच्छा लिखूंगा। आप में से किसी ने 1990 में आई " डेज ऑफ़ बीईंग वाइल्ड" फ़िल्म देखि हो तो पता होगा ...यह एक उदास खालीपन से पूरी भरी हुयी फिल्म है. इसके किरदार कितने रंगों का इंतज़ार जीते हैं...टेलीफोन की घंटी की गूँज को अपने अन्दर बसाए... कैसा अकेलापन होता है कि अपने सबसे गहरे दर्द को एक नितांत अजनबी के साथ बांटने के लिए मजबूर हो जाता है कोई ... इस शुरुआत में एक अंत की गाथा है...एक कहानी जो आपको सबसे अलग कर देती है...फिल्म जहाँ ख़त्म होती है...वहीँ शुरू हो जाती है...you are always in my heart ... --- मौत के पहले के आखिरी लम्हे में वो एक अजनबी से गुज़ारिश करता है कि उस लड़की को हरगिज़ न बताये कि वो वाकई उसे इस आखिरी लम्हे में याद कर रहा है. कि यही उसके लिए बेहतर होगा...कि वो कभी नहीं जाने. ममा आज तुम्हारी बहुत याद आई... और भी कितने लोगों की याद आई...