अपना अपना खुदा - 1
मंटो...कौन मंटो? वही अश्लील कहानियां लिखने वाला... वही न!!! मगर मंटो ने कहा था कि अगर मेरी कहानियां अश्लील लगती हैं तो जिस समाज में आप रहते हैं वह अश्लील है, गंदा है। मेरी कहानियां तो सिर्फ सच दर्शाती हैं। असलियत यही है। असल जिंदगी की कहानियां बहुत अधिक हृदय विदारक हो सकती हैं क्यों कि जिंदगी की जद्दोजहद का दर्पण वहीं कहानियां होती हैं जो के हमारे सामने नही आती, जिनकी चर्चा बहुत कम होती है।
कोई खुद से ही कितने संवाद कर सकता है? कोई कब तक अकेलेपन में जिंदगी गुजार सकता है? हर पल जिंदगी आगे ही भागी जाती है। कई बार ऐसा लगता है कि एक मोड़ पर आकर ईश्वर ने भी हम पर से नियंत्रण छोड़ दिया है। इन्ही अनियंत्रित क्षणों में ही तय होता है आदमी का चरित्र, उसका भविष्य, आगे की दिशा...सब कुछ। हर क्षण का एक कटु सत्य होता है।
मुझे पिछले दो तीन दिन से हल्का सरदर्द था जो घरेलू नुस्खों के बाद भी ठीक न हो पा रहा था। नींद से उठकर मैंने सबसे पहले शहर के मशहूर डॉक्टर के यहां फोन करके नम्बर लगवाया। यह पहुंचा हुआ डाक्टर है और 50 मरीज होने के बाद फिर उठ जाता है। कल नम्बर लगवाने के लिए फोन करने में देरी हुई थी तो कम्पाउंडर बोला था कि आज के 50 मरीज पूरे हो चुके हैं आप कल नम्बर लिखवाना। पढ़े लिखे डॉक्टर के अनपढ़ कम्पाउंडर भी खुद को बड़ा डिग्री वाला डॉक्टर ही मानने लगते हैं। खैर... आज मन को तसल्ली हुई के चलो आज नम्बर लिखा गया। क्योंकि हमारी सोच ऐसी हो चुकी है फलाने डॉक्टर की दवाइयां ही असरदार हैं बाकी नही। दरअसल हम सधे हुए परिंदों की तरह हैं जो कि लीक से हटकर चलना तो दूर उस बारे में सोचते तक नही हैं।
उठकर खिड़की से झांकता हूँ तो दूर तक कोहरा छाया हुआ है, पास की चीजें भी गौर करने पर दिखती हैं। पता नही मेरे शहर के क्या ऐसे ऐमाल हैं कि ऐसी भरी ठंड में पिछले दो दिन से सूरज के दर्शन तक नही हुए हैं। मैं भगवान से मन ही मन कहता हूं कि कम से कम आज तो थोड़ी धूप दिख जाए। पत्नी चाय के लिए पूछती है। मैं हां कह देता हूँ। छत पर जाकर पक्षियों को दाना डालकर आता हूँ। मन मे सोचता हूँ कि मेरा रजाई से निकलने का जी नही करता ये बेचारे बेजुबान पक्षियों को कड़कड़ाती ठंड में दाना चुगने आना पड़ता है। मगर दिमाग में आता ह के जीवन की हरेक समस्या तार्किकता से हल नही हो सकती , कुछ मुआमलों के लिए दिल की ओर मुड़ना ही होता है।
हरेक व्यक्ति की अलग अलग प्राथमिकताएं होती हैं। हो सकता है जो मेरी पहली प्राथमिकता है वह आपकी प्राथमिकताओं की लिस्ट में पाँचवें या दसवें नम्बर पर हो या फिर लिस्ट में हो ही न...। ऐसा इसलिए ह क्योंकि जब आदमी मुफलिसी में गुजारा करता है तो उसकी प्राथमिकता रोटी कपड़ा और मकान तक होती है। जैसे जैसे पैसा बढ़ता जाता है तो प्राथमिकताओं में अच्छा घर, घर मे सुविधाएं, बड़ी गाड़ी, बैंक बेलेंस, पार्टियां, शराब और शबाब से लेकर कबाब तक आ जाता है।
नाश्ता करके नहाने का सोचता हूँ मगर दिल इसकी इजाजत नही देता। गर्म पानी की सुविधा घर मे होने के बावजूद मैं नहाने का काम मुल्तवी कर देता हूँ। सिर्फ चेहरा पॉलिश करके तैयार हो जाता हूँ। भारी जैकेट पहन लेता हूँ ,मफलर भी लपेट लेता हूँ। मगर यह ढीठ ठंड पता नही कि कहां किस रास्ते से होकर मुझ तक पहुंच रही है। घर से निकलते ही देखता हूँ कि घर से बाहर कुछ पिल्ले कातर निगाहों से देख रहे हैं। उनको ब्रेड लाकर डालता हूँ। डॉक्टर के क्लिनिक पहुँचता हूँ। देखता हूँ कि छोटा सा क्लिनिक है। वेटिंग हाल जिसमे बामुश्किल 10-15 लोग बैठ सकते हैं वहां करीब 30 लोग चिपक कर बैठे हुए हैं।। भीड़ दरअसल तीमारदारों के साथ आ जाने से है। कुछ लोग गेट के बाहर खड़े इंतजार कर रहे हैं। मैं भी इन्ही में शामिल हो जाता हूँ।
जिंदगी जीने के कई तरीक़े होते हैं। और हर तरीक़े का अपना अलग रास्ता। हम भविष्य की एक बहुत ही सुखद कल्पना करके उसके अनुसार कार्य करने का सोचते हैं मगर भविष्य वैसा ही हो यह जरूरी नही। और अक्सर ऐसा ही होता है और फिर शुरू होती है जिंदगी की जद्दोजहद। मेरा ध्यान डॉक्टर के क्लिनिक के बाहर टँगे बोर्ड पर जाता है । जिस पर लिखा है देखने का समय सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक, रविवार अवकाश, सामान्य शुल्क 500 रुपये आपातकालीन शुल्क 800 रुपये। अभी करीब साढ़े दस बजे हैं डाक्टर का अता पता नही है। मैं वेटिंग हाल में एक कोने में बैठने लायक जगह बनाकर बैठे हुए कम्पाउंडर से पूछना चाहता हूं कि डॉक्टर कब आएगा। मगर मुझसे पहले ही बार बार मरीज और उनके तीमारदार उससे यही सवाल पूछते हैं। वह उन सबको कुछ न कुछ दिलासा देता है; यह जानते हुए भी के डॉक्टर को खुद पता नही है कि वह आज अपने क्लिनिक कितने बजे पहुंचेगा । यह उसका रोज का काम है। कम्पाउंडर को वैसे भी मरीजों से कोई हमदर्दी नही है। उसके पास ही डॉक्टर का एक और असिस्टेंट बैठा ह। यह असिस्टेंट उस मेडिकल स्टोर को संभालता है कि शहर में केवल इसी पर डॉक्टर की लिखी हुई दवाइयां मिलती हैं। अभी डाक्टर आया नही है तो असिस्टेंट और कम्पाउंडर दोनो पास ही बैठे हैं। कम्पाउंडर थोड़ा स्वस्थ सा दिखता है मगर असिस्टेंट उतना ही दुबला पतला, आंखे धंसी हुई और पिचके गाल वाला है। ऐसे लगता है यह टीबी का मरीज है। मैं सोचता हूँ कि क्या इसे कोई और बीमारी होगी? तभी कम्पाउंडर उसे एक इशारा करता है और अपने मोबाइल में कुछ दिखाता है।और फिर दोनो एक साथ मुंह नीचे करके खींसें निपोरते हैं।
....जारी....
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