अपना अपना खुदा - अंतिम भाग
(भाग 1 से आगे जारी)
बाहर खड़े खड़े मेरी निगाह एक व्हील चेयर पर बैठे बूढ़े आदमी पर जाती है । इस व्हील चेयर को एक बूढ़ी औरत धक्का देकर धीरे धीरे चला रही है। ये दोनों नजदीक आते जाते हैं तो दृश्य और साफ होता जाता है। दोनो के पास ठंड से बचने लायक कपड़े तक नही है। मैं गरीबों के नसीब को कोसने लगता हूँ। मेरी नजर में तकलीफों के अपने पहले से ही तय रास्ते होते हैं। जब तकलीफें आती हैं तो फिर आए ही जाती हैं। उनके बीच खुदा ने कोई हदबंदी नही बनाई। ऐसा लगता है खुदा खुद तकलीफें बहुतों की झोली में डालकर उन्हें दुनिया मे भेजता है और यह निर्धारित करने की कोशिश में रहता है वह इंसान मुसीबतों का कितना बोझ उठा सकता है। मैं सोचता हूँ ये बूढ़ी औरत सीधे ही निकल जायेगी मगर यह क्लिनिक की ओर मुड़ जाती है। मुझे पहली नजर में लगता है कि ये भीख मांगकर गुजारा करते हैं और इसी उम्मीद में यह हम लोगों की तरफ आ रही है मगर वह क्लिनिक के बाहर आकर करीब करीब मेरे पास ही खड़ी हो जाती है। व्हीलचेयर भी उसके साथ है। मैं उन्हें गौर से देखता हूँ। बूढ़ी औरत सूख कर कांटा हो चुकी है। बाल सफेद और माथे पर चिंता की लकीरें। उसके शरीर में जान नही है मगर कोई मजबूरी जरूर है जो उससे व्हीलचेयर खिंचवाती है। इसकी आँखों मे हजारों लाजवाब सवाल दिखते हैं - कुछ कहे कुछ अनकहे हर तरह के सवालात.... और केवल सवाल ही सवाल ...जवाब कोई नही। बूढ़े के दाढ़ी के बाल बढ़े हुए हैं। माथे पर सलवटें हैं। मगर यह खड़े होने की हालत में नही है। बूढ़ी औरत उदास है। वह शायद यहाँ खड़े लोगों से कुछ कहना चाहती है। मगर सभी अनजान हैं शायद इसलिए कुछ कहती नही। शुरुआत मैं ही करता हूँ और पूछता हूं कि अम्मा क्या हुआ है इनको? जवाब में वह जवाब नही देती बल्कि सवाल दाग देती है- बेटा रोजाना भगवान की पूजा करने वाले और सारी दुनिया का भला चाहने वालो को भी ऐसी तकलीफें क्यो सहनी पड़ती हैं? मैं निरुत्तर हो जाता हूँ।
एक औसत आदमी के लिए हरेक तकलीफ देखकर यह सोच लेना ही सबसे आसान रास्ता होता है जिसके साथ जो हो रहा है वह उसके कर्मों का फल है, भगवान की यही इच्छा है , यही विधि का विधान है। इसका कारण यह है कि ऐसा सोचना उसकी मजबूरी है क्योंकि वह चाहकर भी कुछ कर नही सकता। मैं बूढ़ी औरत से बात आगे बढ़ाता हूँ तो पता चलता है कि व्हीलचेयर पर बैठा बूढ़ा आदमी उसका पति है और कुछ दिन से बुखार से परेशान है। वह फौज से पेंशनयाफ्ता है। इनका एक बेटा और एक बेटी थे। बेटा भी फौज में था मगर वह शहीद हो गया। बेटी शादी के बाद इनका मकान जिसमे कि ये रहते थे उसे बेचकर पैसे लेकर चंपत हो गयी। अब वे एक किराये के कमरे में रहते हैं। बूढ़े की दिमागी हालत भी ठीक नही है। उसे शुगर भी है व नियमित रूप से इन्सुलिन पर इसकी जिंदगी चल रही है। मात्र 8000 रुपये पेंशन इन लोगो को अपने रोजाना के खर्चे, दवाइयां, किराया व बाकी सब गुजारा करने के लिए ऊंट के मुंह मे जीरे की तरह है।वह बताती है कि घर मे फोन नही है इस लिए क्लिनिक पर नम्बर लिखवाने के लिए पहले एक बार सबेरे आना पड़ता है और बाद में फिर इनको लेकर । अभी 28 तारीख है इसलिए अभी पेंशन भी नही आई है। पड़ोसी से 300 रुपये उधार लेकर यहां आयी हूँ। वह बेचारा वक्तबेवक्त मदद करता रहता है। वह कहती है कि जरा सी देर में कोई दिल से उतर जाता है तो जरा सी ही देर में कोई दिल मे उतर जाता है, मैं हैरान हूं कि वह ऐसा मुझसे बता रही है या पूछ रही है।
मैं सोचता हूँ कि औलादें कितनी कृतज्ञ या कृतघ्न हो सकती हैं। आदमी जब गम में होता है तो उसे सभी सवालों के जवाब चाहिए होते हैं। वह अपने द्वारा किये गए सभी अच्छे या बुरे कर्मों का हिसाब लगाने लगता है। सड़क पर दिख रहे कितने लोगों के दिलों में क्या क्या उदासियाँ छिपी हुई हैं, कौन जानता है।विज्ञान की इतनी तरक्की के बावजूद भी उदासी की दवाई अभी तक नही आई है। खुदा भी सबके लिए बराबर नही है। वह भी कहीं कम कहीं ज्यादा रहता है।
इन्ही ख्यालों में खोए हुए कम्पाउंडर की मरीज नम्बर 11 की तेज आवाज सुनकर मेरा ध्यान उस तरफ जाता है।मेरा नम्बर पन्द्रहवां है। मैं सोचता हूँ कि इस बार कौन सा मरीज जाएगा। देखता हूँ कि 11 नम्बर सुनकर वह बूढ़ी औरत अंदर जाने लगती है। उसके अंदर जाने के बाद फिर से खामोशी पसर जाती है। सोचता हूं कि डॉक्टर की रोजाना की कमाई कम से कम बीस हजार रुपये है और ये बूढ़े बूढ़ी आठ हजार रुपये से महीने का खर्च चलाने को मजबूर हैं। डॉक्टर के पास पहुँचने के जरा देर बाद ही अंदर से तेज आवाजें आने लगती हैं। हम सोचते हैं कि पता नही क्या बात हो गयी है। थोडी देर हो जाने पर मैं खुद डॉक्टर के केबिन का गेट खोलकर अंदर जाता हूँ। बूढ़ी औरत हाथ जोड़े खड़ी है। डॉक्टर का चेहरा तमतमाया हुआ है वह चिल्ला रहा है कि यह सरकारी खैराती दवाखाना नही है। पता चलता ह के बूढ़ी औरत डॉक्टर की 500 रुपये फीस के बजाय 200 ही दे रही है। मुझे याद आता है कि ये 200 भी उन्ही 300 में से होंगे जो वह किसी भले आदमी से उधार मांगकर लायी है।
समाज मे कितना दुख भरा हुआ है । कोई अमीर सौ दो सौ रुपये छोड़ने को तैयार नही है और किसी की जिंदगी ही वह सौ दो सौ रुपये हैं। बूढ़ी औरत मुझे अंदर देखकर परेशान हो जाती है। मैं अपनी जेब से 500 का नोट निकालकर डॉक्टर को थमाता हूँ। बूढ़ी औरत के 200 रुपये उसे वापस कर देता हूँ। और केबिन से बाहर निकल जाता हूँ। बाहर बैठे लोग सवाल भरी नजरों से मुझे देखते हैं। उन्हें इच्छा है कि उन्हें वह सब बताया जाए कि जो अंदर हुआ है। आप ही बताइए कि क्या मेरे बता देने से उन बूढ़े दम्पति की मुसीबतें कम।हो जाएंगी... बिल्कुल नही।
मैं क्लिनिक से बाहर निकल जाता हूँ। अब मुझे चाय की तलब लगी है। मैं अपनी बीमारी के लिए डॉक्टर से बिना मिले ही घर की तरफ चल देता हूँ। रास्ते मे एक कब्रिस्तान पड़ता है। यहां बड़ा एकांत है। कोई भी यात्रा अकेले नही चलती। न जाने क्या क्या अपने साथ लेकर चलती है। जीवन मे हरेक यात्रा में सहजता, अच्छाइयां, उपकार के साथ साथ वे बुराइयां और अपराध भी शामिल हैं जिनके लिए कभी माफी नही मांगी गई। कब्रिस्तान का ऐसा एकांत कम से कम इतनी सहूलियत तो देता है कि यहां बैठकर अपने गुनाहों को कबूला जा सके। इसके गेट के बाहर सड़क पर एक बूढ़ा आदमी चाय का ठेला लगाता है। वह 8 रुपये की चाय देता है। सोचता हूँ कि बड़े बड़े मॉलों में मात्र 499 का मूल्य लिखकर भी वे 500 का नोट मिलने पर 1 रुपया वापस नही करते मगर यह चाय वाला एक चाय के लिए दस के नोट में से 2 रुपये हमेशा वापस करता है। मैं उससे चाय लेता हूँ। मेरी नजर अंदर की कब्रो पर पड़ती है। पता नही कैसे कैसे महान या घटिया लोग होंगे जो यहां जमींदोज हुए पड़े हैं। जिंदगी के हजारों रंग हैं। हरेक आदमी का अपना अपना खुदा है। कुछेक आदमियों का खुदा हमेशा उनके साथ रहकर उनका हरेक काम बनवाता है जबकि बाकियों के खुदा का कहीं अता पता नही है। उसने उनको इस दुनिया मे केवल तकलीफ झेलने भेजा है।
किसी भले शायर ने कहा है कि-
कौन इस घर की देखभाल करे,
रोज इक चीज टूट जाती है।
(चित्र गूगल से साभार)
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