मासूम ख़तावार
कह नही सकते कि उस शख्श पे क्या गुजरती होगी जो ये जानता है कि जो गलती उसने नही की है फिर भी उसने सबसे उसके लिए माफी मांगी मगर किसी ने उसे मुआफ़ नही किया हो। किसी और के किये की सजा किसी और को मिलना कहाँ तक जायज है। पता नहीं कोई ऐसा शख्श भी रातों को कैसे सोता होगा जो जानता है फलां शख़्स ने वह जुर्म नही किया मगर उसने किसी और को बचाने की खातिर उसने सिर्फ जुर्म का एतिराफ़ किया है।
सड़क पर लोग इकट्ठे थे। मैंने देखा एक कार सड़क के किनारे खड़ी थी और भीड़ बेतरतीब तरीके से एक रिक्शेवाले को घेरे थी। मैंने ध्यान दिया कि उसके रिक्शे का आगे वाला पहिया टूट गया था। देखते ही कोई भी बता देगा के इस गाड़ीवाले की टक्कर से ऐसा हुआ होगा। कारवाला सुटिड बूटिड था वहीं रिक्शेवाले पर ठंड से बचने लायक कपड़े भी बदन पर नही पहने थे। उसके चेहरे को गौर से देखा तो पाया कि मेरे आने से पहले उस पर दो चार लोगों ने हाथ साफ किया है। मेरे देखने तक भी रिक्शेवाले को गर्दन से पीछे तक कारवाले ने पकड़ा हुआ था। कारवाले कि हाइट मेरे हिसाब से रिक्शेवाले से एक फिट ऊपर रही होगी।
आप सोचिए कि जब खुदा ने आपको किसी से हर एस्पेक्ट में ऊंचा रखा हो और आप सामने वाले को परेशान कर रहे हो तो खुदा के सामने जाने पर आप इसे कैसे जायज़ ठहराएंगे।
क्या इस दुनिया मे भलाई के लिए कोई जगह नही बची। क्यो बड़े लोग छोटो पर गुस्सा दिखाते हैं? मैं वहां जाकर रिक्शेवाले को छुड़ाया । भीड़ रिक्शेवाले पर टूट पड़ने को तैयार थी। शायद भीड़ में ऐसे लोग भी होते हैं जो अपने घर से , ऑफिस से ,बीवी से , दिमाग से या किसी और तरीके से इस कदर परेशान होते हैं कि ऐसे बीच सड़क पर किसी गरीब पर हाथ छोड़कर खुद के दिमाग को आराम देना चाहते हैं। रिक्शेवाले से मैंने पूछा तो उसने बताया कि लाइट हरी होने पर उसने रिक्शा चलाया मगर ये साहब दूसरी साइड से जबरदस्ती घुस आए। मेरे रिक्शे का आगे वाला पहिया तोड़ दिया और अपनी गलती नही मानकर उल्टे मेरी ही पिटाई कर रहे हैं। मैंने लोगों को घूरा । कुछ लोगो को शर्मिंदगी का एहसास हुआ तो वे अपनी राह चलते बने। कारवाला जल्दी से निकल गया। गरीब आदमी की रोजी मारी गयी, पिछले दस पांच दिन की कमाई भी अब रिक्शे को ठीक करवाने में जाएगी, पिटाई अलग से हुई।
क्या ये कारवाला जो अंदर ही अंदर जानता ह के ग़लती उसकी खुद की है, क्या वह आज घर जाकर चैन से सो पायेगा? क्या खुदा को कोई जवाब नही देना है? क्या खुद की नजरों में कोई इंसान गिरता नही। एक बार 2013 या 14 में चित्तौड़गढ़ के रेलवे स्टेशन के बाहर एक आदमी से मुलाकात हुई थी। वह वहां चाय बेचता था। उसका कहना था कि वह इलाहाबाद का रहने वाला था। किसी घरेलू मुद्दे पर सही बात कहने पर उसे घर छोड़ देने को मजबूर कर दिया गया। पूछने पर बताया कि अब कभी वहां नही जाएगा। यहाँ बहुत ठीक तरह से रोजी कमा रहा हूँ। मैंने पूछ लिया कि याद नही आती ह क्या? उसने आसमान की ओर देखा और ठंडी आह भरकर जवाब दिया याद भला क्यों नही आएगी साहब।अपने चाहे कैसी भी गलती क्यो न कर दें, वे अपने ही रहते हैं। मैंने उसकी आँखों मे एक वीरान दुनिया देखी... एक ऐसा खालीपन जो कभी न भरा जाएगा। मैं अंदर ही अंदर सहम गया। क्या वे लोग जिन्हें हम अपने कहते हैं इतने निर्दयी हो जाते हैं कि जिम्मेदारी उठाने वाले को ही दोषी घोषित कर देते हैं। क्या विश्वास रहेगा किसी ऐसे निर्दोष आदमी का ऊपर वाले पर... दुनियादारी पर.... इंसानियत पर...
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