कुछ अनकहा
एक सामान्य इंसान भागता है रिश्तों के लिए... अपनों के लिए... एक अच्छे भविष्य के लिए...। ऐसा होता है कि अगर अच्छा भविष्य न भी हो (यहां न होने से मेरा तातपर्य है कि अगर कोई अच्छी बड़ी नौकरी न होकर एक छोटी नौकरी भी हो) तो इससे काम चल जाता है मगर अगर सब कुछ होते हुए भी अच्छे रिश्ते न रहें तो आदमी फिर आदमी नही रह जाता है। कोई आखिर कब तक रिश्तों के पीछे भागे? ऐसे ही भागते रहने के बाद एक समय ऐसा आता है जब इंसान इन सब रिश्तों से दूर भागने लगता है। स्थायित्व की ख़ोज में जाना चाहता है वह।
मेरे जीवन का अनुभव कहता है कि बहुत सी बाते ऐसी होती हैं जो कभी कही नहीं जाती। वे बातें हमेशा भीतर ही रह जाती हैं। और कोई इंसान घुटता रहता है अंदर ही अंदर। एक ऐसे शख्श के बारे में मैं जानता हूँ। कभी 2008 का कोई महीना... एक दफा कॉलेज में इलेक्ट्रोमेग्नेटिज्म की क्लास के बाद सब छात्र लोग चर्चा कर रहे थे तो एक ने उससे पूछा था कि आगे पोस्टग्रेजुएट के बाद क्या करोगे? वह इस सवाल से थोड़ा घबरा गया था। जरूरी है क्या के जो वह लड़का उस वक्त चाहता था वह उसे आने वाले वक्त में मिल ही जाता ? उसने कोई जवाब नही दिया। औरों ने कहा कि ये किताबी कीड़ा है इसलिए लगता है लेक्चरर ही बनेगा। पास ही लड़कियों का वह ग्रुप चुहल कर रहा था जिसमे से एक लड़की वह भी थी। सबकी मिलीजुली आवाजों में उसने उस दिन उस लड़की की वह आवाज साफ साफ सुनी थी । उसने कहा था कि अजी हाँ... बन गया ये लेक्चरर। उस लड़की को वह कनखियों से निहारा करता था। एक दो बार क्लास में उस लड़की को थोड़ा नजदीक पाकर वह नर्वस भी हो गया था । उससे कुछ कह नही पाता था। सुनते हैं लड़कियों की चार आंखें होती हैं दो आगे और दो सिर के पीछे। पीछे वाली आंखों से वह ऐसे आशिको को पहचान लेती हैं।मगर यह लड़की यहां मात खा गई थी। और ये मजे की बात ह के अगले ही साल उस शख्श का का लेक्चरर का एक्जाम क्लियर हो गया था। मगर यह नसीब होता है कि हम चाहते कुछ और हैं और होता कुछ और है। चाहता तो वह भी बहुत कुछ था मगर वह मिला नही।
एक इंसान को रिश्तों की चाहत होती है। उस शख्श जिसने घर के हालात समझते हुए बचपन में भी अमीरजादों जैसी घटिया मांगें मां बाप के सामने नही रखी... छात्र के रूप में केवल किताबों के साथ रहा, एक नौकरी भी पाई। एक दूसरी नौकरी प्राप्त करने के बाद घर की जिम्मेदारी उठाई। पूरा जीवन बन्धन में गुजारकर सफलता प्राप्त करने वाले उस शख्श पर अगर इस सब
के बाद भी ऐसे बन्धन रिश्तों द्वारा लगाएं जाएं तो ऐसे रिश्तों को कौन ही चाहेगा? जीवन उस जगह ठहराव चाहता है, जहां ऐसे रिश्तों की बेड़ियां न हों । और आज़ाद चेतना के साथ जीवन बसर किया जाए परन्तु यह जीवन की विडम्बना है कि जैसा हम चाहते हैं,अक्सर वैसा होता नहीं...। जब तमाम अंजुमन में तन्हाईयाँ बिछी हुई हों तो भंवरा खुश कैसे रहे? ये आश्चर्य कहा जायेगा कि उसने लेक्चरर की नही बल्कि कोई और नौकरी की... पता नही क्यो?
(चित्र गूगल से साभार)
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